❤  प्रेम नाजुक बात है। प्रेम को अगर ठीक से समझा, तो उसमें यह बात समाहित है कि दूसरे का ध्यान रखना। प्रेम का अर्थ ही यह होता है कि दूसरे का ध्यान रखना। तुम किसी के गले लगना चाहते हो, लेकिन दूसरा लगना चाहता है या नहीं ? इतना काफी नहीं है कि तुम गले लगना चाहते हो। शुभ है कि तुम्हारे हृदय में गले लगने का भाव जगा। धन्यभागी हो! आभारी बनो प्रभु के। लेकिन इतने से जरूरी नहीं है कि दूसरे को तुम्हारे कंधे लगना ही पड़ेगा। तब तो प्रेम न हुआ, तब तो बलात्कार हुआ। तब तो तुमने दूसरे के साथ जबर्दस्ती की, यह तो हिंसा हो गयी। यह तो प्रेम के बहाने हिंसा हो गयी।

प्रेम तो रत्ती - रत्ती संभलकर चलता है, इंच - इंच संभलकर चलता है। प्रेम तो देखता है कि दूसरा कितने दूर तक चलने को राजी है, उससे इंच भर ज्यादा नहीं चलता। क्योंकि प्रेम का अर्थ ही है कि तुम्हें दूसरे का खयाल आया। दूसरे का मूल्य! दूसरा साध्य है, साधन नहीं! तुम गले लगना चाहते हो; दूसरा लगना चाहता है या नहीं ? दूसरे को देखकर कदम उठाना। और धीरे - धीरे कदम उठाना, अन्यथा दूसरा घबड़ा ही जाएगा। तब तुम्हारा प्रेम आक्रमण जैसा मालूम पड़ेगा। तुमने दूसरे की चिंता ही न की। तुम इतनी देर भी न रुके कि पूछ तो लेते कि मैं पास आता हूं, आ जाऊं ?

प्रेम सदा द्वार पर दस्तक देता है। पूछता है, क्या भीतर आ सकता हूं? अगर इनकार आये, तो प्रतीक्षा करता है, नाराज नहीं हो जाता। क्योंकि यह दूसरे की स्वतंत्रता है। दूसरे का स्वत्व है, अधिकार है कि वह कब तुम्हारे गले लगे, कब न लगे। तुम्हें प्रेम का अवरतण हुआ है, उसे तो नहीं हुआ। तुम्हारे भीतर प्रेम फैलना शुरू हुआ है, उसे तो तुम्हारे प्रेम का कोई पता नहीं। और वह दूसरा व्यक्ति तो प्रेम के नाम पर इतने धोखे खा चुका है कि उसे क्या पता कि फिर कोई नया धोखा नहीं पैदा हो रहा है। प्रेम के नाम पर ही लोगों को सताया गया है, इसलिए लोग सकुच गये हैं। मां ने किया प्रेम, बाप ने किया प्रेम, भाई ने किया प्रेम, पत्नी ने किया प्रेम, मित्रों ने किया प्रेम, और सबने प्रेम के नाम पर चूसा, और सबने प्रेम के नाम पर तुम्हारी छाती पर पत्थर रखे। बहाना प्रेम था, काम कुछ और लिया। जिसने भी कहा, मुझे तुमसे प्रेम है, उसी से तुम डरने लगे। क्योंकि अब कुछ और होगा! इस प्रेम के पीछे छिपा हुआ कोई न कोई रोग होगा...........

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