प्रेम की इतनी महिमा है तो फिर मैं प्रेम करने से डरता क्यों हूं?

प्रेम की इतनी महिमा है तो फिर मैं प्रेम करने से डरता क्यों हूं?

प्रेम खतरनाक मार्ग है। अपने को गंवाना पड़ता है तब कोई प्रेम को पाता है। इतनी कीमत चुकानी पड़ती है। सस्ता सौदा नहीं है, महंगा सौदा है। अपने को खोने की तैयारी चाहिए। जब इतनी तैयारी हो——

दिलो—दिमाग को रो लूंगा आह कर लूंगा
मैं तेरे इश्क में सब कुछ तबाह कर लूंगा
जब इतनी तैयारी हो तो प्रेम और उसकी महिमा का स्वाद मिलना शुरू होता है।
फिर प्रेम रुलाता भी बहुत है। क्योंकि आज तुम प्रेम करोगे तो आज थोड़े ही प्रेमी मिल जाएगा! लंबी विरह की रात्रि आएगी तब मिलन की सुबह होती है। विरह की रात्रि का भी डर होता है। इसलिए लोग प्रेम करने से घबड़ाते हैं कि कौन विरह को सहेगा! समझदार आदमी इस तरह की बातों में पड़ते ही नहीं। क्योंकि उसमें पीड़ा है।

कोई ऐ "शकील' देखे यह जुनून नहीं तो क्या है
कि उसी के हो गए हम जो न हो सका हमारा
न मालूम कितनी रातों यहीं रोना पड़ेगा——कि उसी के हो गए हम जो न हो सका हमारा। तुमने चाहा और प्रेम उसी वक्त थोड़े ही घट जाता है! प्रेम परीक्षाएं मांगता है, कसौटियां मांगता है। प्रेम की विरह की अग्नि से गुजरना पड़ता है तभी तुम योग्य के लिए पात्र हो पाते हो; तभी तुम प्रेम को पाने के अधिकारी हो जाते हो।

कोई ऐ "शकील' देखे यह जुनून नहीं तो क्या है
कि उसी के हो गए हम जो न हो सका हमारा
यह पागलपन नहीं तो और क्या है? पागलपन मालूम होता है प्रेम।
समझदार बच जाते हैं, इस पागलपन की तरफ नहीं जाते। समझदार धन कमाते हैं, प्रेम नहीं। समझदार दिल्ली की यात्रा करते हैं, प्रेम की नहीं। समझदार और सब करते हैं, प्रेम से बचते हैं क्योंकि प्रेम पागलपन है। और पागलपन है ही। बुद्धि की सब सीमाओं को तोड़कर, बुद्धि की सारी व्यवस्थाओं को तोड़कर प्रेम उमगता है। इसलिए तुम डरते होओगे। विचारशील आदमी होओगे।

कहूं किससे मैं कि क्या है शबे—गम, बुरी बला है
मुझे क्या बुरा था मरना अगर एक बार होता
प्रेमी को कितनी बार मरना पड़ता है इसका पता है? बार—बार मरना पड़ता है, हर बार मरना पड़ता है। हर बार विरह जब घेरती है, मौत घटती है। इंच—इंच मरना पड़ता है।
कहूं किससे मैं कि क्या है शबे—गम, बुरी बला है——वह जो विरह की लंबी रात है, बड़ी खतरनाक है।
मुझे क्या बुरा था मरना अगर एक बार होता——एक बार मर जाता तो भी कोई बात थी। मरते हैं, मरते हैं। जी भी नहीं पाते, मर भी नहीं पाते। प्रेमी की बड़ी फांसी लग जाती है। प्रेम फांसी है; मगर फांसी के बाद ही सिंहासन है। याद करो जीसस की कहानी। सूली लगी, और सूली के बाद ही पुनरुज्जीवन। प्रेम सूली है।
और जिसने प्रेम नहीं जाना उसे भक्ति से तो मिलना कैसे हो पाएगा? प्रेम भक्ति का बीज है। भक्ति प्रेम का फूल है। प्रेम ही प्रगाढ़ होते—होते एक दिन भक्ति बनता है। जो प्रेम से वंचित रह गया, वह भक्ति से वंचित रह जाएगा। और अगर भक्ति करेगा तो उसकी भक्ति थोथी होगी, औपचारिक होगी, क्रियाकांड होगी, पाखंड होगी, दिखावा होगी, धोखा होगी।

बरस रही है हरीमे—हविस में दौलते—हुस्न
गदाए—इश्क के कासे में इक नजर भी नहीं
न जाने किसलिए उम्मीदवार बैठा हूं
इक ऐसी राहपै जो तेरी रहगुजर भी नहीं
बहुत बार ऐसा लगेगा कि कहां बैठा हूं, किसकी राह देख रहा हूं? न कोई आता, न कोई जाता। कहीं ऐसा तो नहीं है एक ऐसी राह पर बैठा हूं जहां से परमात्मा का निकलना होने ही वाला नहीं है ! जहां से प्रेमी गुजरेगा ही नहीं!

न जाने किसलिए उम्मीदवार बैठा हूं
इक ऐसी राहपै जो तेरी रहगुजर भी नहीं
कभी तुझे गुजरते भी नहीं देखा। कभी तेरे पैरों की चाप भी नहीं सुनी। मैं कहीं ऐसा व्यर्थ बैठे—बैठे व्यर्थ ही तो नहीं हो जाऊंगा?
प्रेम बड़ी प्रतीक्षा मांगता है, बड़ा धीरज मांगता है। और जिनके पास धीरज की कमी है वे प्रेम के रास्ते पर नहीं जा सकते। और यहां तो सारे लोग जल्दी में हैं। अभी हो जाए कुछ, इसी वक्त हो जाए कुछ, मुफ्त में हो जाए कुछ, उधार हो जाए कुछ। न तो कोई कीमत चुकाने को राजी है, न कोई प्रतीक्षा करने को राजी है, न कोई विरह के आंसू गिराने को राजी है।

हम भी तस्लीम की खू डालेंगे
बे—नियाजी तेरी आदत ही सही
प्रेमी को तो कहना पड़ता है, अगर तेरा उपेक्षाभाव तेरी आदत है तो रहे तेरी आदत, सम्हाल तू अपनी आदत। हम भी तस्लीम की खू डालेंगे——हम भी धैर्य की आदत डालेंगे।

हम भी तस्लीम की खू डालेंगे
बे—नियाजी तेरी आदत ही सही
तू रख अपनी आदत बेपरवाही की। मतकर चिंता हमारी, मत ले खोज—खबर, मत देख हमारी तरफ। तू कर उपेक्षा जितनी कर सकता हो। हम अपने धीरज से तेरी उपेक्षा को हराएंगे।
लंबी यात्रा है विरह की, आंसुओं की। मगर जो हिम्मत कर लेता है, पूरी हो जाती है। और जिसे एक बार थोड़ा—सा भी स्वाद लग जाता है प्रेम का, फिर लौट नहीं पाता। फिर सिर गंवाना हो तो सिर गंवाता है। फिर जो गंवाना हो, गंवाने को राजी होता है।

जीते—जी कूचः—ए—दिलदार से आया न गया
उसकी दीवार का सर से मिरे साया न गया
एक बार उसकी दीवाल की छाया भी तुम पर पड़ जाए तो फिर चाहे जान रहे कि जाए, तुम उसके दीवाल के साए को छोड़कर जा न सकोगे।
तुम तो मंदिर भी हो आते हो, लौट आते हो। तुम्हारा मंदिर झूठा है। उसके मंदिर जाकर कोई कभी लौटा है? जो गया सो गया। जो गया सो उसके मंदिर का हिस्सा हो गया।

जीते—जी कूचः ए—दिलदार से आया न गया
प्रेमी की गली से कोई जिंदा लौटता है?
उसकी दीवार का सर से मेरे साया न गया
इतनी हिम्मत नहीं है इसलिए प्रेम की महिमा सुन लेते हो, बुद्धि से समझ भी लेते हो, फिर भी भीतर—भीतर डरे रहते हो।

यह हाल था शब—ए—वादा कि ता—ब—रहगुजर
हजार बार गया मैं, हजार बार आया
कितनी बार जाना पड़ता है देखने द्वार पर कि कहीं प्रेमी आ तो नहीं गया? विरह की रात्रि में पत्ता भी खड़कता है तो गलता है, उसी का आगमन हो रहा है। हवा का झोंका आता है तो लगता है, उसी का आगमन हो रहा हैं। राह से कोई अजनबी गुजर जाता है तो लगता है, वही आ गया।

यह हाल था शब—ए—वादा कि ता—ब—रहगुजर
हजार बार गया मैं, हजार बार आया
——सोने की फिर चैन नहीं। प्रेम में जो पड़ा वह जागा।
इसलिए मैं तुमसे कहता हूं, दो मार्ग हैं परमात्मा तक जाने के। एक मार्ग है, ध्यान। ध्यान का अर्थ है, जागो। जो जागेगा वह प्रेम करने लगेगा। जागा हुआ आदमी घृणा नहीं कर सकता क्योंकि जागे हुए आदमी को दिखाई पड़ता है, सब एक है। मैं ही हूं। यहां किसी को चोट पहुंचाना अपने ही गाल पर चांटा मारना है। यहां किसी को दुःख देना अपने को ही दुःख देना है। जागे हुए पुरुष को दिखाई पड़ता है, एक का ही विस्तार है, एक ही परमात्मा सबमें छाया है। प्रेम अपने आप पैदा होता है।
दूसरा रास्ता है प्रेम का। प्रेम करो और तुम जाग जाओगे क्योंकि प्रेमी सो नहीं सकता। उसकी प्रतीक्षा में पलक लगे कैसे? उसकी राह देखनी पड़ती है, कब आ जाए, किस क्षण आ जाए, किस द्वार से आ जाए, किस दिशा से आ जाए। प्रेम हिम्मत की बात है, दुस्साहस की बात है।
तुम पूछते हो, "प्रेम की इतनी महिमा है तो फिर मैं प्रेम करने से डरता क्यों हूं?' इसीलिए डरते हो। महिमा का तुम्हें थोड़ा—थोड़ा बोध होने लगा है। आकर्षण पैदा हो रहा है, कशिश पैदा हो रही है। प्रेम पुकार दे रहा है। और अब भय पकड़ रहा है। अच्छे लक्षण हैं, भय की मानकर रुकना मत। भय के बावजूद प्रेम की पुकार सुनना और प्रेम के स्वर को पकड़कर चल पड़ना।
प्रेम परमात्मा का आयाम है। निकटतम कोई मार्ग अगर परमात्मा के पास ले जानेवाला है तो प्रेम है। ध्यान का मार्ग लंबा है और रूखा—सूखा है; मरुस्थल जैसा है। प्रेम का मार्ग बहुत हरा—भरा है। प्रेम के मार्ग पर गंगा बहती है, मरुस्थल नहीं है। छोड़ो अपनी नौका गंगा में। भय तो पकड़ता है। जब भी कोई नई यात्रा को निकलता है, नए अभियान को, अज्ञात अनजान की खोज में, भय स्वाभाविक है। लेकिन स्वाभाविक भय का अर्थ यह नहीं है कि उसके कारण रुको।

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