शरण बड़ा अदभुत शब्द है
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शरण बड़ा अदभुत शब्द है। शरण का अर्थ है कि मैं कहता हूं अब मैं नहीं हूं, तू ही है। और अब तू जो करेगा, जो करवाएगा, उससे मैं राजी हूं, स्वीकार करता हूं। मेरी एक्सेप्टेबिलिटी है।
जीसस मर रहे हैं, आखिरी क्षण में सूली पर लटके हैं। एक क्षण को उनके मन में, ऐसे ही आ गया होगा भाव, जैसे हमारे मन में छाता खोलने का आता है..बारिश दिनो मे..आ गया एकदम एक क्षण को भाव, कि मैं परमात्मा के लिए जिंदगीभर जीया और आखिर मुझे सूली लग रही है! एक क्षण को कहीं बुद्धि ने सवाल उठा दिया होगा।
और एक क्षण को जीसस ने आकाश की तरफ देखकर कहा कि यह तू क्या करवा रहा है? छोटी-सी शिकायत थी, बहुत बड़ी नहीं, कि यह तू क्या करवा रहा है?
लेकिन तत्काल फिर खयाल आया कि यह तो शिकायत हो गई, यह तो सलाह हो गई परमात्मा को। यह तो मैं सलाह देने लगा कि तू क्या करवा रहा है! इसका अर्थ तो यह हुआ कि मेरी इच्छा कुछ और थी, जो होना चाहिए, और तू कुछ और करवा रहा है। यह तो मेरी इच्छा खड़ी हो गई!
उनकी आंख से दो आंसू के बूंद टपक पड़े। और उन दो बूंदों ने उन्हें वहां पहुंचा दिया, जिसको श्रीकृष्ण शरण कह रहे हैं। दो बूंद उनकी आंखों में आ गए।
और उन्होंने जोर से कहा कि नहीं, नहीं, मुझे क्षमा कर; दाय विल बी डन–तेरी ही इच्छा पूरी हो। मैं कौन हूं! मुझे माफ कर दे। मुझसे भूल हो गई। मुझसे गलती हो गई। यह मैंने क्या कहा तुझसे कि यह तू क्या करवा रहा है!
इतनी-सी शिकायत जीसस के लिए बाधा थी। तो मैं निरंतर कहता हूं कि इस आखिरी क्षण तक भी जीसस क्राइस्ट नहीं थे। इस आखिरी क्षण तक वे जीसस ही थे। लेकिन यह आखिरी वक्तव्य, एक सेकेंड में सब दुनिया बदल गई। वह आंख से दो आंसू का गिर जाना और जीसस का कहना, दाय विल बी डन, तेरी मर्जी पूरी हो। और फिर प्रसन्न हो जाना और उस सूली पर ऐसे झूल जाना, जैसे वह झूला हो। वह जीसस, क्राइस्ट हो गए उसी क्षण। उसी क्षण वे मनुष्य न रहे, परमात्मा के निकट हो गए।
जिस क्षण कोई व्यक्ति अपने को परमात्मा की शरण में छोड़ देता है, उसी क्षण परमात्मा के साथ एक हो जाता है।अब यह जिंदगी का पैराडाक्स है कि जब तक हम अपने को बचाते हैं, अपने को खोते हैं; और जिस दिन अपने को खो देते हैं, उस दिन हम अपने को बचा लेते हैं। और जब तक हम अपने को बचाएंगे, कुछ हमारे हाथ में आएगा नहीं; खाली होगी मुट्ठी। और जिस दिन हम खोल देंगे, उस दिन यह सारी संपदा, यह सारा जगत, यह सब कुछ, यह सब कुछ हमारा है। लेकिन जब तक मैं है भीतर, तब तक यह सब हमारा नहीं हो सकता है। यह मैं ही हमारा दुश्मन है, लेकिन मैं हमें मित्र मालूम पड़ता है।
एक बहुत अदभुत आदमी हुआ है, इकहार्ट। उसने मजाक में एक दिन परमात्मा से सुबह प्रार्थना की है। लेकिन उसकी प्रार्थना कीमती है और मन में रख लेने जैसी है। इकहार्ट ने एक दिन सुबह प्रार्थना की परमात्मा से कि हे प्रभु, मेरे दुश्मनों से तो मैं निपट लूंगा, मेरे मित्रों से तू निपट ले। मेरे दुश्मनों से मैं निपट लूंगा। उनकी तू फिक्र छोड़। मैं काफी हूं। लेकिन मेरे मित्रों से तू निपट ले; उनसे मैं बिलकुल नहीं निपट पाता।
इकहार्ट का शिष्य साथ में था। उसने यह प्रार्थना सुनी। वह बड़ा हैरान हुआ। हैरान इसलिए हुआ कि सवाल तो दुश्मनों से ही होता है निपटने का; मित्रों से तो कोई सवाल नहीं होता! और यह इकहार्ट क्या पागलपन की बात कह रहा है। कहीं गलती तो नहीं हो गई शब्दों की जमावट में! कहना चाहता हो कि मेरे मित्रों से मैं निपट लूंगा, दुश्मनों से तू निपट ले। कहीं भूल तो नहीं हो गई!
इकहार्ट जैसे ही प्रार्थना के बाहर हुआ, मित्र ने हाथ पकड़ा और कहा कि मालूम होता है, तुम कुछ भूल कर गए।
यह तुमने क्या कहा! मित्रों से निपटने की कोई जरूरत ही नहीं है। और तुमने परमात्मा से कहा कि शत्रुओं से तो मैं निपट लूंगा, मेरे मित्रों से तू निपट ले।
इकहार्ट ने कहा कि मैं तुझसे कहता हूं कि जिन-जिन को हमने मित्र समझा है, वे ही हमारे शत्रु हैं, और उनसे निपटना बड़ा मुश्किल है। और उनमें सबसे बड़ा मित्र है मैं, ईगो। यह बहुत मित्र मालूम पड़ता है। हम इसी को तो जिंदगीभर बचाते हैं।
यही है जहर, क्योंकि यही मैं शरण न जाने देगा। यही मैं सिर न झुकाने देगा। यही मैं छोड़ने न देगा आपको कि आप लेट गो में पड़ जाएं।
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