आपकी दोनों आंखों के बिच में एक बिंदु है जहां से यह संसार नीचे छुट जाता है और दुसरा संसार शूरू होता है । उसके उस पार,  जिस जगत हम परिचित हैं वह है, उसके उस पार एक अपरिचित और अलौकिक जगत है । इस अलौकिक जगत के प्रतीक की तरह सबसे पहले तिलक खोजा गया ।
           तो तिलक हर जगह लगा देने की बात नहीं है। वह तो जो व्यक्ति हाथ रख कर आपका बिंदु खोज सकता है वही आपको    बता सकता है कि तिलक कहां लगाना है। हर कहीं तिलक लगा लेने से कोई मतलब नहीं है, कोई प्रयोजन नहीं है।
        फिर प्रत्येक व्यक्ति का बिंदु भी एक ही जगह नहीं होता ।वह जो दोनों आंखों के बीच तिसरी आंख है, यह प्रत्येक व्यक्ति की बिलकुल एक जगह नहीं होती, अंदाजा दोनों आंखों के बीच मे ऊपर होती है, पर फर्क होते हैं । अगर किसी व्यक्ति ने पिछले जन्मों में  बहुत साधना की हैं और समाधि के छोटे -मोटे अनुभव पाएँ है तो उसी हिसाब से वह बिंदु  निचले आता जाता है। अगर इस तरह की कोई साधना नहीं की है तो वह बिंदु काफी ऊपर होता है। उस बिंदु की अनुभूति से यह भी जाना जा सकता है कि आपके पिछले जन्मों की साधना कुछ है समाधि की दिशा में?  आपने तीसरी आंखों से कभी दुनिया को देखा है ? कभी भी आपके किसी जन्म में ऐसी कोई घटना घटी है? तो आपका वह बिंदु, उसका स्थान बताएगा। कि ऐसी घटना घटी है या नहीं घटी है।
       अगर ऐसी घटना बहुत घटी है तो वह बिंदु बहुत नीचे आ जाएगा । वह करीब -करीब दोनों आंखों के समतुल भी आ जाता है, उससे नीचे नहीं आ सकता । और अगर बिलकुल समतल बिंदु हो, दोनों आंखों के बिलकुल बीच में आ गया हो, तो जरा से इशारे से आप समाधि में प्रवेश कर सकते हैं । इतने छोटे इशारे से कि जिसको हम कह सकते हैं इशारा बिलकुल असंगत है।

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