धर्म कोई बिषय थोड़े ही है ।
धर्म की कोई सीमा थोड़े ही है । धर्म तो समस्त जीवन का नाम है ।
जीवन में जो कुछ भी समाविष्ट है , धर्म उस सभी के संबंध में -
वक्तव्य देने का हकदार है ।
राजनीतिज्ञ धर्म के संबंध में वक्तव्य नहीं दे सकता , क्योंकि राजनीति की सीमा है ; लेकिन धार्मिक व्यक्ति राजनीति के संबंध में
वक्तव्य दे सकता है , क्योंकि धर्म की कोई सीमा नहीं है ।
धर्म असीम है ' धर्म तो पूरे जीवन को घेरता है , जैसे आकाश घेरता है ... । धर्म से तो कोई भी चीज छोडी़ नहीं जा सकती ।
धार्मिक व्यक्ति की दृष्टि तो सब संबंधों में होगी ।
मैं काव्य पर भी बोलूंगा , क्योंकि धर्म की एक काव्य - दृष्टि भी है ।
इसलिए इस देश में कवियों को दो नाम दिये हैं -- कवि और ऋषि ।
ऋषि हम उस कवि को कहते हैं जिसकी कविता में धर्म बोलता है ; जिसकी
कविता में ईश्वर का अनुभव बोलता है । जिसने काव्य को धर्म में रंग दिया , उसको हम ऋषि कहते हैं । जैसे रविन्द्रनाथ को ऋषि कहना चाहिए , कवि नहीं उनकी गीतांजलि का वही मूल्य होना चाहिए जो किसी भी उपनिषद का है । वे ऋषि हैं ।
उन्होंने जो कहा है उसमें एक अनुभव की धार है , एक रस बहा है ।
रस --- जो उनका नहीं है ! रस --- जो उनके ऊपर से आ रहा है ।
वे तो केवल माध्यम हैं । जैसे बांसुरी किसी के ओंठ पर रखी बजती है । बांसुरी को यह भ्रांति पैदा हो जाये कि ये स्वर मेरे हैं , तो कवि ।
और बांसुरी को यह पता चलता रहे कि स्वर किसी और के हैं , मैं जिसके ओंठ पर रखी हूं उसके हैं , तो ऋषि ।
रविन्द्रनाथ को यह बोध निरंतर रहा है कि जो मैं गा रहा हूं , वह ओंठ पर मेरे हैं , मगर गीत किसी और का है ।
मैं सिर्फ उपकरण हूं , निमित्तमात्र हूं ।
तो मैं तो काव्य पर भी बोलूंगा । मैं तो कला पर भी बोलूंगा , क्योंकि
कला का भी एक धार्मिक आयाम है । जैसे अजंता , एलोरा , खजुराहो , कोणार्क , भुवनेश्वर के मंदिर , पुरी के मंदिर ।
तुम जानकर हैरान होओगे कि ताजमहल भी सूफी आधारों पर निर्मित हुआ है । इतिहास में उसकी चर्चा नहीं की जाती , क्योंकि इतिहास जो लोग लिखते हैं उनको इतनी गहराई तक न समझ होती है , न चेष्टा करते हैं । उन्होंने तो समझा कि बस है किसी सम्राट की अपनी प्रेयसी के लिए बनाई गई याददाश्त , बात खत्म हो गयी ।
लेकिन इस की खोज में कभी गये नहीं कि सम्राट ने बडे़ सूफी संतो से सलाह - मश्विरा किया । ताजमहल को इस ढंग से बनाया गया है कि अगर पूरे चांद की रात में तुम घंटे - भर बैठकर उसको सिर्फ देखते रहे तो ध्यानस्थ हो जाओगे । वह अदभुत धार्मिक कला का नमूना है । एक विशिष्ट दशा में , एक विशिष्ट भाव से और एक विशिष्ट कोण से अगर तुम देखोगे तो ताजमहल मंदिर है , मकबरा नहीं । देखने-देखने की बात है ।
बुद्ध की और महावीर की हमने जो प्रतिमाएं बनाई हैं , वे प्रतिमाएं केवल मूर्तिकला के सबूत नहीं है । मूर्तिकला गौण है ; उन प्रतिमाओं में हमने बुद्धत्व को समाने की कोशिश की है ।
अगर तुम बुद्ध की प्रतिमा के सामने बैठकर अपलक निहारते रहोगे , तो जल्दी ही तुम पाओगे तुम्हारे भीतर भी कोई चीज थम गई , ठहर गई । तुम्हारे विचार की प्रक्रिया रुक गयी , तुम्हारे भीतर धीरे से निर्विचार आ गया । उस प्रतिमा के रुप में , ढंग में , रंग में ,
तुम्हारे भीतर ध्यान को उपजाने की व्यवस्था है ।
वह प्रतिमा एक यंत्र है , जिससे तुम्हारे भीतर ध्यान को प्रेरणा दी जा सकती है ।
तो मैं मूर्तिकला पर भी बोलूंगा । मैं तो जीवन के हर अंग पर बोलूंगा
क्योंकि मैं धार्मिक हूं , इसलिए मेरे लिए जीवन का कोई अंग अछूता
नहीं है , अछूता नहीं छूटेगा । मैं किसी हिस्से को अछूत नहीं मानता
मैं राजनीतिज्ञ नहीं हूं ,लेकिन राजनीति पर बोलूंगा । क्योंकि राजनीति सिर्फ राजनीति तो ही नहीं है , उससे तुम्हारे जीवन का बहुत कुछ निर्धारित होगा । उस निर्धारण में तुम्हारा धर्म भी - प्रभावित होगा ।
अब जैसे समझो कि -----
भारत ने एक राजनीति तय कर ली ---- धर्मनिरपेक्षता की ।
इसका परिणाम धर्म पर होने वाला है । यह बात गलत है ।
कोई राष्ट्र धर्मनिरपेक्ष नहीं होना चाहिए ।
हां , किसी विशिष्ट संप्रदाय का प्रभुत्व न हो यह ठीक है , लेकिन
धर्मनिरपेक्ष तो कैसे कोई राज्य हो सकता है ?
हिंदू न हो , मुसलमान न हो , यह तो ठीक है ।
होना ही नहीं चाहिए हिंदू और मुसलमान । लेकिन एक अति है कि राष्ट्र हिंदू हो जाता है , कि मुसलमान हो जाता है ; दूसरी अति है कि
राज्य अधार्मिक हो जाता है कि हमें धर्म से कुछ लेना-देना नहीं !
आदमी के प्राण का इतना बहुमूल्य हिस्सा --- और तुम कहोगे हमें उससे कुछ लेना-देना नहीं ! उसके घातक परिणाम होंगे ।
राज्य को धर्म की तरफ सुविधा बनानी ही होगी ।
राज्य को धार्मिक नहीं होने की जरुरत है हिंदू-मुसलमान के अर्थ में
मगर धार्मिक होने की जरुरत है इस अर्थ में कि देश में ध्यान बढे़ ,
प्रेम बढे़ , शांति बढे़ । लोगों के जीवन में योग उतरे ।
लोगों के जीवन में एक अंतरंग अनुशासन जन्मे ।
लोगों के भीतर आत्मा पैदा हो ।
तो मैं तो विरोध करुंगा धर्मनिरपेक्ष राज्य का ।
राज्य को तो धर्म को वैसे ही गति देनी चाहिए जैसे माली पानी सींचता है वृक्षों में , ताकि फूल खिलें ; चेतना के फूल खिलेंगे नहीं अन्यथा । फिर लाख तुम उपाय करते रहो कि लोग नैतिक हो जायें ,
लोग सदाचारी हो जायें , सचरित्र हो जायें ; वे सब उपाय असफल हो जायेंगे । क्योंकि फूल खिलेंगे ही नहीं , तुमने जडो़ं को पानी ही न दिया ।
धर्म जड़ है जीवन की सारी नीति की । और अगर राज्य धर्मनिरपेक्ष
है तो राजनीति नीति तो बिलकुल नहीं होगी , अनीति हो जायेगी ।
वही हुआ है ।
तो मैं तो राजनीति की आलोचना करुंगा , समस्त बुध्दों ने की है ।
समस्त बुध्दों के वक्तव्य हैं । जीसस को सूली न लगाई गयी होती ,
अगर उन्होंने उस समय की राजनीति का विरोध न किया होता ।
राजनीति महत्वाकांक्षा से चलती है ।
राजनीति एक रोग है । और दुनिया को राजनीति से धीरे-धीरे मुक्त करना है ।
क्योंकि जितनी ऊर्जा राजनीति में लग जाती है , वही ऊर्जा धर्म में
लगे तो लोगों के जीवन में बडा़ आनंद , बडा़ उत्सव फले ।
🌹
धर्म की कोई सीमा थोड़े ही है । धर्म तो समस्त जीवन का नाम है ।
जीवन में जो कुछ भी समाविष्ट है , धर्म उस सभी के संबंध में -
वक्तव्य देने का हकदार है ।
राजनीतिज्ञ धर्म के संबंध में वक्तव्य नहीं दे सकता , क्योंकि राजनीति की सीमा है ; लेकिन धार्मिक व्यक्ति राजनीति के संबंध में
वक्तव्य दे सकता है , क्योंकि धर्म की कोई सीमा नहीं है ।
धर्म असीम है ' धर्म तो पूरे जीवन को घेरता है , जैसे आकाश घेरता है ... । धर्म से तो कोई भी चीज छोडी़ नहीं जा सकती ।
धार्मिक व्यक्ति की दृष्टि तो सब संबंधों में होगी ।
मैं काव्य पर भी बोलूंगा , क्योंकि धर्म की एक काव्य - दृष्टि भी है ।
इसलिए इस देश में कवियों को दो नाम दिये हैं -- कवि और ऋषि ।
ऋषि हम उस कवि को कहते हैं जिसकी कविता में धर्म बोलता है ; जिसकी
कविता में ईश्वर का अनुभव बोलता है । जिसने काव्य को धर्म में रंग दिया , उसको हम ऋषि कहते हैं । जैसे रविन्द्रनाथ को ऋषि कहना चाहिए , कवि नहीं उनकी गीतांजलि का वही मूल्य होना चाहिए जो किसी भी उपनिषद का है । वे ऋषि हैं ।
उन्होंने जो कहा है उसमें एक अनुभव की धार है , एक रस बहा है ।
रस --- जो उनका नहीं है ! रस --- जो उनके ऊपर से आ रहा है ।
वे तो केवल माध्यम हैं । जैसे बांसुरी किसी के ओंठ पर रखी बजती है । बांसुरी को यह भ्रांति पैदा हो जाये कि ये स्वर मेरे हैं , तो कवि ।
और बांसुरी को यह पता चलता रहे कि स्वर किसी और के हैं , मैं जिसके ओंठ पर रखी हूं उसके हैं , तो ऋषि ।
रविन्द्रनाथ को यह बोध निरंतर रहा है कि जो मैं गा रहा हूं , वह ओंठ पर मेरे हैं , मगर गीत किसी और का है ।
मैं सिर्फ उपकरण हूं , निमित्तमात्र हूं ।
तो मैं तो काव्य पर भी बोलूंगा । मैं तो कला पर भी बोलूंगा , क्योंकि
कला का भी एक धार्मिक आयाम है । जैसे अजंता , एलोरा , खजुराहो , कोणार्क , भुवनेश्वर के मंदिर , पुरी के मंदिर ।
तुम जानकर हैरान होओगे कि ताजमहल भी सूफी आधारों पर निर्मित हुआ है । इतिहास में उसकी चर्चा नहीं की जाती , क्योंकि इतिहास जो लोग लिखते हैं उनको इतनी गहराई तक न समझ होती है , न चेष्टा करते हैं । उन्होंने तो समझा कि बस है किसी सम्राट की अपनी प्रेयसी के लिए बनाई गई याददाश्त , बात खत्म हो गयी ।
लेकिन इस की खोज में कभी गये नहीं कि सम्राट ने बडे़ सूफी संतो से सलाह - मश्विरा किया । ताजमहल को इस ढंग से बनाया गया है कि अगर पूरे चांद की रात में तुम घंटे - भर बैठकर उसको सिर्फ देखते रहे तो ध्यानस्थ हो जाओगे । वह अदभुत धार्मिक कला का नमूना है । एक विशिष्ट दशा में , एक विशिष्ट भाव से और एक विशिष्ट कोण से अगर तुम देखोगे तो ताजमहल मंदिर है , मकबरा नहीं । देखने-देखने की बात है ।
बुद्ध की और महावीर की हमने जो प्रतिमाएं बनाई हैं , वे प्रतिमाएं केवल मूर्तिकला के सबूत नहीं है । मूर्तिकला गौण है ; उन प्रतिमाओं में हमने बुद्धत्व को समाने की कोशिश की है ।
अगर तुम बुद्ध की प्रतिमा के सामने बैठकर अपलक निहारते रहोगे , तो जल्दी ही तुम पाओगे तुम्हारे भीतर भी कोई चीज थम गई , ठहर गई । तुम्हारे विचार की प्रक्रिया रुक गयी , तुम्हारे भीतर धीरे से निर्विचार आ गया । उस प्रतिमा के रुप में , ढंग में , रंग में ,
तुम्हारे भीतर ध्यान को उपजाने की व्यवस्था है ।
वह प्रतिमा एक यंत्र है , जिससे तुम्हारे भीतर ध्यान को प्रेरणा दी जा सकती है ।
तो मैं मूर्तिकला पर भी बोलूंगा । मैं तो जीवन के हर अंग पर बोलूंगा
क्योंकि मैं धार्मिक हूं , इसलिए मेरे लिए जीवन का कोई अंग अछूता
नहीं है , अछूता नहीं छूटेगा । मैं किसी हिस्से को अछूत नहीं मानता
मैं राजनीतिज्ञ नहीं हूं ,लेकिन राजनीति पर बोलूंगा । क्योंकि राजनीति सिर्फ राजनीति तो ही नहीं है , उससे तुम्हारे जीवन का बहुत कुछ निर्धारित होगा । उस निर्धारण में तुम्हारा धर्म भी - प्रभावित होगा ।
अब जैसे समझो कि -----
भारत ने एक राजनीति तय कर ली ---- धर्मनिरपेक्षता की ।
इसका परिणाम धर्म पर होने वाला है । यह बात गलत है ।
कोई राष्ट्र धर्मनिरपेक्ष नहीं होना चाहिए ।
हां , किसी विशिष्ट संप्रदाय का प्रभुत्व न हो यह ठीक है , लेकिन
धर्मनिरपेक्ष तो कैसे कोई राज्य हो सकता है ?
हिंदू न हो , मुसलमान न हो , यह तो ठीक है ।
होना ही नहीं चाहिए हिंदू और मुसलमान । लेकिन एक अति है कि राष्ट्र हिंदू हो जाता है , कि मुसलमान हो जाता है ; दूसरी अति है कि
राज्य अधार्मिक हो जाता है कि हमें धर्म से कुछ लेना-देना नहीं !
आदमी के प्राण का इतना बहुमूल्य हिस्सा --- और तुम कहोगे हमें उससे कुछ लेना-देना नहीं ! उसके घातक परिणाम होंगे ।
राज्य को धर्म की तरफ सुविधा बनानी ही होगी ।
राज्य को धार्मिक नहीं होने की जरुरत है हिंदू-मुसलमान के अर्थ में
मगर धार्मिक होने की जरुरत है इस अर्थ में कि देश में ध्यान बढे़ ,
प्रेम बढे़ , शांति बढे़ । लोगों के जीवन में योग उतरे ।
लोगों के जीवन में एक अंतरंग अनुशासन जन्मे ।
लोगों के भीतर आत्मा पैदा हो ।
तो मैं तो विरोध करुंगा धर्मनिरपेक्ष राज्य का ।
राज्य को तो धर्म को वैसे ही गति देनी चाहिए जैसे माली पानी सींचता है वृक्षों में , ताकि फूल खिलें ; चेतना के फूल खिलेंगे नहीं अन्यथा । फिर लाख तुम उपाय करते रहो कि लोग नैतिक हो जायें ,
लोग सदाचारी हो जायें , सचरित्र हो जायें ; वे सब उपाय असफल हो जायेंगे । क्योंकि फूल खिलेंगे ही नहीं , तुमने जडो़ं को पानी ही न दिया ।
धर्म जड़ है जीवन की सारी नीति की । और अगर राज्य धर्मनिरपेक्ष
है तो राजनीति नीति तो बिलकुल नहीं होगी , अनीति हो जायेगी ।
वही हुआ है ।
तो मैं तो राजनीति की आलोचना करुंगा , समस्त बुध्दों ने की है ।
समस्त बुध्दों के वक्तव्य हैं । जीसस को सूली न लगाई गयी होती ,
अगर उन्होंने उस समय की राजनीति का विरोध न किया होता ।
राजनीति महत्वाकांक्षा से चलती है ।
राजनीति एक रोग है । और दुनिया को राजनीति से धीरे-धीरे मुक्त करना है ।
क्योंकि जितनी ऊर्जा राजनीति में लग जाती है , वही ऊर्जा धर्म में
लगे तो लोगों के जीवन में बडा़ आनंद , बडा़ उत्सव फले ।
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