Yaswant ji prajapati
जिसको हम साकार कहते हैं, वह भी निराकार से संयुक्त है। जिसको हम निराकार कहते हैं, वह साकार से संयुक्त है और हम साकार में खड़े है। मूर्ति की दृष्टि, इस सत्य को स्वीकार करके चलती है कि हम साकार में खड़े हैं, वह हमारी स्थिति है। उसको इनकार करने का उपाय नहीं है। और हम जहां खड़े हैं, वहीं से यात्रा शुरू हो सकती है।
ध्यान रहे, हमें जहां होना चाहिए वहां से यात्रा शुरू नहीं होती; हम जहां हैं वहीं से यात्रा शुरू हो सकती है। बड़ी तार्किक दृष्टियां वहां से शुरू करती हैं यात्रा, जहां हमें होना चाहिए। जो हम हैं ही नहीं, वहां से यात्रा शुरू नहीं हो सकती। जहां हम है, यात्रा वहीं से शुरू होगी।
हम कहां है? हम मूर्त में जी रहे हैं। हमारी सारी अनुभव की संपदा मूर्त की संपदा है। हमने कुछ भी ऐसा नहीं जाना जो .मूर्त न हो, आकारवाला न हो। हमने सब आकार में जाना है। प्रेम किया है तो आकार को, और घृणा की है तो आकार को; आसक्त हुए है तो आकार में और अनासक्ति साधी है तो आकार में। मित्र बने हैं तो आकार में और शत्रु बनाए है तो आकार में। हमने जो भी किया है वह आकार है। मूर्ति इस सत्य को स्वीकार करती है। और इसलिए अगर हमें निराकार की यात्रा पर निकलना है तो हमें निराकार के लिए भी आकार देना पड़ेगा। निश्चित ही ये आकार अपनी—अपनी प्रतिमा के आकार होंगे। किसी ने महावीर में निराकार को अनुभव किया है, किसी ने कृष्ण में निराकार को अनुभव किया है, किसी ने जीसस में निराकार के दर्शन किए हैं। जिसने जीसस में निराकार के दर्शन किए हैं, जिसने जीसस की आंखों में झांका, और वह दरवाजा मिल गया उसे, जिससे खुला आकाश दिखाई पड़ता है।
जिसने जीसस का हाथ पकड़ा, थोड़ी देर में वह हाथ मिट गया और अनंत का हाथ, हाथ में आ गया। जिसने जीसस की वाणी सुनी, और शब्द नहीं शब्द के जो पार है, उसकी प्रतिध्वनि हृदय में गज गयी, वह अगर जीसस की मूर्ति बनाकर पूजा में लग सके तो निराकार में छलांग के लिए उसे इससे ज्यादा आसान कोई और बात न हो सकेगी।
किसी को कृष्ण में दिखाई पड़ा है, किसी को बुद्ध में, किसी को महावीर में। जहां से भी, और सबसे पहले हमें 'किसी' में ही दिखाई पड़ेगा, यह स्मरण रखें। सबसे पहले हमें सीधा, शुद्ध निराकार दिखाई नहीं पड़ जाएगा। शुद्ध निराकार को देखने की हमारी क्षमता और पात्रता नहीं है। निराकार भी बंधकर ही आएगा कहीं तभी हमें दिखाई पड़ेगा। अवतार का यही अर्थ है, निराकार का बंधा हुआ रूप, निराकार की सीमा। उल्टा लगता है, पर यही अर्थ है अवतार का। एक झरोखा, जहां से बड़ा आकाश दिखाई पड़ जाता है—एक झलक! निराकार से सीधी मुलाकात नहीं होगी। पहले तो कहीं आकार में ही उसकी प्रतीति होगी। फिर जिस आकार में उसकी प्रतीति हो जाए, उस आकार से बार—बार उसी प्रतीति में उतरना आसान हो जाएगा।
जिसको हम साकार कहते हैं, वह भी निराकार से संयुक्त है। जिसको हम निराकार कहते हैं, वह साकार से संयुक्त है और हम साकार में खड़े है। मूर्ति की दृष्टि, इस सत्य को स्वीकार करके चलती है कि हम साकार में खड़े हैं, वह हमारी स्थिति है। उसको इनकार करने का उपाय नहीं है। और हम जहां खड़े हैं, वहीं से यात्रा शुरू हो सकती है।
ध्यान रहे, हमें जहां होना चाहिए वहां से यात्रा शुरू नहीं होती; हम जहां हैं वहीं से यात्रा शुरू हो सकती है। बड़ी तार्किक दृष्टियां वहां से शुरू करती हैं यात्रा, जहां हमें होना चाहिए। जो हम हैं ही नहीं, वहां से यात्रा शुरू नहीं हो सकती। जहां हम है, यात्रा वहीं से शुरू होगी।
हम कहां है? हम मूर्त में जी रहे हैं। हमारी सारी अनुभव की संपदा मूर्त की संपदा है। हमने कुछ भी ऐसा नहीं जाना जो .मूर्त न हो, आकारवाला न हो। हमने सब आकार में जाना है। प्रेम किया है तो आकार को, और घृणा की है तो आकार को; आसक्त हुए है तो आकार में और अनासक्ति साधी है तो आकार में। मित्र बने हैं तो आकार में और शत्रु बनाए है तो आकार में। हमने जो भी किया है वह आकार है। मूर्ति इस सत्य को स्वीकार करती है। और इसलिए अगर हमें निराकार की यात्रा पर निकलना है तो हमें निराकार के लिए भी आकार देना पड़ेगा। निश्चित ही ये आकार अपनी—अपनी प्रतिमा के आकार होंगे। किसी ने महावीर में निराकार को अनुभव किया है, किसी ने कृष्ण में निराकार को अनुभव किया है, किसी ने जीसस में निराकार के दर्शन किए हैं। जिसने जीसस में निराकार के दर्शन किए हैं, जिसने जीसस की आंखों में झांका, और वह दरवाजा मिल गया उसे, जिससे खुला आकाश दिखाई पड़ता है।
जिसने जीसस का हाथ पकड़ा, थोड़ी देर में वह हाथ मिट गया और अनंत का हाथ, हाथ में आ गया। जिसने जीसस की वाणी सुनी, और शब्द नहीं शब्द के जो पार है, उसकी प्रतिध्वनि हृदय में गज गयी, वह अगर जीसस की मूर्ति बनाकर पूजा में लग सके तो निराकार में छलांग के लिए उसे इससे ज्यादा आसान कोई और बात न हो सकेगी।
किसी को कृष्ण में दिखाई पड़ा है, किसी को बुद्ध में, किसी को महावीर में। जहां से भी, और सबसे पहले हमें 'किसी' में ही दिखाई पड़ेगा, यह स्मरण रखें। सबसे पहले हमें सीधा, शुद्ध निराकार दिखाई नहीं पड़ जाएगा। शुद्ध निराकार को देखने की हमारी क्षमता और पात्रता नहीं है। निराकार भी बंधकर ही आएगा कहीं तभी हमें दिखाई पड़ेगा। अवतार का यही अर्थ है, निराकार का बंधा हुआ रूप, निराकार की सीमा। उल्टा लगता है, पर यही अर्थ है अवतार का। एक झरोखा, जहां से बड़ा आकाश दिखाई पड़ जाता है—एक झलक! निराकार से सीधी मुलाकात नहीं होगी। पहले तो कहीं आकार में ही उसकी प्रतीति होगी। फिर जिस आकार में उसकी प्रतीति हो जाए, उस आकार से बार—बार उसी प्रतीति में उतरना आसान हो जाएगा।
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