जय प्रजापति

आदरणीय बंधुओ !
उप्लब्ध जानकारी और शब्दों के साथ अपने विचार शेयर करना चाहता हूँ जिसका मकसद किसी भी तरह किसी भी आदरणीय के सम्मान को ठेस पहचाना बिलकुल नहीं है और ये विचार निजी है जिनसे हर कोई सहमत हो ये भी संभव नही है क्योंकि सब्का अपना ज्ञान और अनुभव अलग अलग होता है।

*प्रजापति समाज की गतिविधियों को 80 और 90 के दशक से अपने  जितना देखा और जाना है उसके आधार पर अपने विचार रखना चाहूंगा।

*सबसे पहले उत्तर प्रदेश में प्रजापति समाज की प्रमुख हस्तियों का संक्षिप्त परिचय-

-श्री शिवचरण प्रजापति,पूर्व मंत्री एवं 4 बार विधायक,हमीरपुर।
-श्री दयाराम प्रजापति,पूर्व केबिनेट मंत्री एवं 2 बार MLC
-श्री गायत्री प्रसाद प्रजापति,पूर्व केबिनेट मंत्री।
-श्री हरिमुनि जी महाराज, विधायक,हरिद्वार(उत्तराखंड बनने के पहले)
-श्री लोकेश प्रजापति,पूर्व MLC,मेरठ,
-श्री बृजेश प्रजापति ,वर्तमान विधायक -बीजेपी,तिंदवारी,बांदा।

इनके अलावा विभिन्न आयोग में रहे सदस्य-श्री रमेश चंद्र प्रजापति जी मोदीनगर,श्री फिरेराम प्रजापति जी,मोदीनगर,
श्री राजकुमार प्रजापति जी,मुरादाबाद,श्रीमती कुसुम प्रजापति,श्री योगेंद्र बेचैन प्रजापति आदि।

*आगे बात करते है उत्तर प्रदेश में समाज की सामाजिक और रेजनेटिक स्थिति पर।

उत्तर प्रदेश में सर्वप्रथम बसपा में हमीरपुर से श्री शिवचरण प्रजापति जी विधायक बने और राज्य मंत्री भी रहे।ये सब देखते हुए समाजवादी पार्टी ने श्री दयाराम प्रजापति जी को MLC बनाया जिससे प्रजापति समाज की  पहचान बढ़ी और उन्होंने पूरे उत्तर प्रदेश में घूम घूमकर समाज को जगाने और जागरूकता लाने का काम किया जिसमें श्री रामलखन प्रजापति जी आदि काफी लोगों  ने भी दिन रात पूरे प्रदेश में भ्रमन किया।

और उस समय सीमित संचार माध्यमो के बावजूद कई वर्षों से एक्टिव श्री फिरेराम प्रजापति जी के नेतृत्व में रॉष्ट्रीय प्रजापति महासभा के  द्वारा सामाजिक जागरूकता  अभियान चलते हुए देखा और क्योंकि उस समय जिला स्तर पर हमारे बड़े भाई स्वर्गीय केहर सिंह प्रजापति एक्टिव थे और तब  फिरेराम जी,रमेश चंद्र जी आदि नेता हमारे गाँव में हमारे घर आते थे तब हम कुछ समझ नही पाते थे-सामाजिक जागरूकता,एकता जैसे शब्द क्या होते है,पर अब समझ आता है।

इस प्रकार हमारे आस पास उस समय जो सक्रियता देखते थे उसका प्रभाव ये हुआ की 1990 के बाद से समाज में कई नेता सामने आये और राजनीति में भी पहचान मिली।जिसके बाद देखने में आया की इस चमक से प्रभावित होकर और कई लोग खड़े हुए जिन्होंने अपनी अलग पहचान बनाने की खातिर नित नए संगठन खड़े किये पर् दुखद पहलु ये रहा की उनका मकसद केवल निजी रहा न की समाज के लिए और सैकड़ो लोग केवल लेटर हेड पर नेता बन गए और केवल अपने स्वार्थ सिद्धि में लगे रहे।और शार्ट कट ढूंढते हुए केवल सत्ता के गलियारों में भटक कर समाज को भूल गए और जब पीछे देखे तो समाज ने उनको भुला दिया और मजबूरी वश ऐसे लोग केवल चाटुकार बन कर रह गए।

काबिले तारीफ है कि आज तक उत्तर प्रदेश और बाहर के कई राज्यों तक रॉष्ट्रीय प्रजापति महासभा ने अपनी निरंतरता के साथ विशिष्ट पहचान को कायम रक्खा है।

इस प्रकार उत्तर प्रदेश में 1990 के बाद से कुम्हार् समाज की पहचान बननी शुरू हुई थी वो 2017 तक की सरकारों में बड़े स्तर पर पहुची लेकिन एक दुखद पहलु ये भी रहा की राजनित्ति को शार्ट कट समझकर खुद को रातों रात चमका लेने की चाहत्त में सैकड़ों लोगों ने इधर उधर भटकते हुए प्रजापति समाज  का नाम सब पार्टी की नजरों में इतना गिरा दिया की 5%आबादी के बावजूद भी 2 पार्टी ने 1-1 और एक ने 2 टिकेट दिए।और जिसने 1-1 दिया भी तो 2 को आपस में ही लड़ा दिया।और उनमें से एक मात्र विधायक बने भी 5 राज्यओं के चुनाव में।
और आज हम बहुत खुश है ,होना भी चाहिए।
पर क्या हमारे समाज के लोग इस बात पर विचार करेंगे की हमारा  समाज सबसे ज्यादा शिक्षित है ईमानदार है म्हणत करना जानता है पर तब भी कोई इन पर विश्वास नहीं करता।
ऐसा क्यों है?

मुझे लगता है-
*हम लोग केवल मेहनत के बल पर आज तक आगे बढे है।
* हम लोग ईमानदार और संतुष्ट प्रवृत्ति के है।
*हम लोग लड़ना जानते है पर केवल अपनों से।
*हम लोगों ने खुद को कमजोर होने का एहसास करा दिया है।
*हम लोगों की आदत बन चुका है अपनों की टांग खींचना पर दूसरों के पीछे चलना।
*अपना कोई अगर समाज हित में आगे आयेगा तो उसको कमजोर करते है दूसरों से मिलकर।
*अगर मैं नहीं तो कोई नहीं।
*अपना अपनो को नीचा दिखाने को पुतले तक फुकवा देता है

ऐसे और बहुत से कारण है पर समझे कौन और क्यों समझे?सबको केवल अपनी लगी है।

इस बार ही नहीं हर बार ऐसा हुआ है कि हर पार्टी कुम्हार् समाज के बिखराव के कारणों से भलीभांति परिचित है कि ये लोग तो केवल आपस में लड़ते रहे है और एक भी सीट नहीं जीता सकते तो इनको क्या टिकेट देना।इनके साथ 2 शब्द प्यार से बोल लेना तो ये उसी पर जान लगा देंगे और वोट तो ये हमें ही देंगे।

तो आज हमें निराश नही होना चाहिए।क्योंकि जो मिल गया वो 5%समाज की संतुष्टि के लिए काफी है।

अगर हम उत्तर प्रदेश में पिछली सरकार में अपने समाज की सत्ता में भागेदारी की बात करें तो वो शायद सर्वश्रेष्ठ रहा जिसमे एक मंत्री एक विधायक और 6 आयोग सदस्य के अलावा पार्टी में कार्यकारिणी सदस्य के अलावा विभिन्न जनपदों में विभिन्न पदों पर सैकड़ो लोगो के होने के बाद भी ये सब लोग अपने समाज को खुद से नहीं जोड़ सके और केवल अपने तक सीमित रह गए इसलिए समाज ने भी इनका साथ नही दिया और आज फिर वही के वही खड़े रह गया अपना समाज।

दोष नेताओं का या समाज का?

मेरे अनुसार दोनों का दोष है।
आखिर जब 5%की जनसंख्या में 1 या 2 विधायक हो तब क्या उनके लिए संबकी इच्छाएं पूरी करना संभव हो सकता है?
और अगर अपने प्रयास से कोई व्यक्ति विधायक बन गया तो पूरे प्रदेश के लोग उससे अपनी मांग की  लंबी लिस्ट को पूरा करा लेना चाहते है।और एक व्यक्ति के लिये पूरे समाज को संतुष्ट करना संभव नहीं हो सकता, तब हम उसकी कमियां निकालकर उसको बदनाम करते है और ये बात जब पार्टी में जाती है तो अपने बन्दे का वजन कम हो जाता है जिसका परिणाम अगले चुनाव में दीखता है -एक टिकेट और फिर हम शिकायत में लग जाते है।
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*एक और बात देखि की आजकल एक नया दौर चला  है कई लोगों ने राजनैतिक पार्टी बनाकर खुद को रॉष्ट्रीय अध्यक्ष बनाकर समाज का बेड़ा गर्क करने में बहुत मेहनट की है,समाज को एसे महान लोगों का आभारी होना चाहिए।

*पिछले 10 साल में अपने समाज में जो जागरूकता आयी है उसका कोई जवाब नही पर एक बड़ा नुकसान ये हुआ है कि सोशल मीडिया और वे आप्प की क्रांति से आज अपने समाज में सैकड़ो से आगे बढ़कर हजारों संगठन बन गए है।हर कोई नया ग्रुप बनाकर समाज को एकजुट करने की बात तो करता है पर समाज एक क्यों नहीं है और एकजुट कैसे हो?
इसका जवाब किसी के पास नहीं है और यही सबसे बड़ा कारण है अपने समाज के बिखरने का, पिछड़ने का।

*एकता न होने का कारण अपनी समझ से-

-अति महत्वाकांक्षा का हावी होना,
-निजी स्वार्थ को ऊपर रखना।
-समाज की खातिर त्याग की भावना का अभाव।

💐ख़ुशी की बात ये है कि अपने समाज के वो बंधू,बुद्धिजीवी वर्ग जो हमेशा राजनीति और संगठनों से दूरी बनाकर ही रहते थे अब काफी रुच्ची लेने लगे है समाज की गतिविधियों में और वो भी चाहते है कि अपना समाज एकजुट होकर आगे आये पर अभी समय लगेगा।

*केवल अपने ही समाज का दुर्भाग्य रहा है कि आज तक  जिला,राज्य और रॉष्ट्रीय स्तर पर एक भी सर्वमान्य नेता नहीं पैदा कर सके और कई बार ऐसी आशाएं पैदा हुई तो वो भी उम्मीदों पर खरा नहीं उतर पाए।

आखिर क्या हो और कैसे हो?
क्या हम लोग निजी हितों और लालच का त्याग कर सकेंगे?

क्या हम समाज को ऊपर रखने का साहस कर सकेंगे?

क्या समाज के सैकड़ो संघटन समाज की खातिर एक मंच पर नहीं आ सकते?

क्या हम समाज के मुद्दों पर एकजुट एकसूर में आवाज नहीं उठा सकते?

क्या हम युवा नेतृत्व खड़ा कर सकेंगे?

क्या हम अपने बीच की प्रतिभाओं को आगे बढ़ने में उनके पीछे खड़े होकर मदद कर सकेंगे?

क्या हम ऐसा सोच सकते है कि जो हमसे आगे है उसको और आगे बढ़ने में मदद करे और जो हमसे पीछे है उसको और आगे बढ़ाने के लिए उसका हाथ अपने हाथ में ले सकने की हिम्मत करेंगे?

अगर नहीं तो भुला दीजिये समाज का हित और भूल जाए की हम समाज के विकास की सोच रखते है?
सब बेईमानी है।

-आप हम कुछ नही भी करेंगे तो ये अपना भोला समाज पहले भी चल रहा था आगे भी चलेगा,अपने हिसाब से।

(क्या उत्तर प्रदेश में हम हरयाणा,गुजरात,राजस्थान आदि राज्यो से कुछ सीख कर और बेहतर नहीं कर सकते?)

-निवेदक
आपका अपना
कृष्ण देव सिंह प्रजापति
सह-संस्थापक
रॉष्ट्रीय वरिष्ठ ऊपाध्यक्ष
संयोजक उत्तर प्रदेश

भारतीय प्रजापति हीरोज़ आर्गेनाईजेशन(रजि0)

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