जीवन
यह मत पूछें कि हम सरल कैसे हो जाएं।
इतना ही जान लें कि हम जटिल कैसे हो गए हैं।
कैसे रोज हम जटिल होते चले जा रहे हैं।
एक पल नहीं बीतता, हम और जटिल हो जाते हैं।
एक घड़ी नहीं बीतती, हम और उलझ जाते हैं।
सारी जिंदगी उलझाव की एक लंबी कथा है।
बच्चे सरल और सीधे पैदा होते हैं,
के उलझे हुए मर जाते हैं।
इसीलिए तो जिंदगी भर आदमी पीछे
की तरफ लौट—लौट कर सोचता रहता है
कि बड़ी खुशी थी बचपन में,
बड़ा आनंद था बचपन में,
बड़ी शांति थी बचपन में। अब सब खो गई।
क्या बात थी बचपन में? कौन सी खुशी थी?
कौन सा आनंद था? कौन सी शांति थी?
शांति यही थी कि सरलता थी,
खुशी यही थी कि सरलता थी,
आनंद यही था कि सरलता थी।
जटिल होता जाता है
आदमी और दुख और पीड़ा
और चिंता से भरता चला जाता है।
होना तो उलटा था कि आदमी की
उम्र जैसे बढ़ती वह और सरल होता,
और सरल होता।
और अंत क्षण तक
इतना सरल हो जाता कि उसकी सरलता
में और प्रभु के बीच कोई फासला न रह जाता,
कोई दीवाल न रह जाती, कोई गांठ न रह जाती,
कोई ग्रंथि न रह जाती।
लेकिन नहीं, उलटा होता है,
गांठ रोज बढ़ती चली जाती है,
रोज बढ़ती चली जाती है।
हम सब गांठों को कमाने वाले लोग,
हमारे लिए परमात्मा सरल नहीं हो सकता है।
इसलिए जब धर्मगुरु हमें समझाते हैं
कि परमात्मा कठिन है,
हम बिलकुल राजी हो जाते हैं
कि ठीक कहते हैं, परमात्मा कठिन है।
मैं आपसे कहता हूं झूठ कहते हैं।
परमात्मा कठिन नहीं, कठिन आप हैं।
और अपनी कठिनाई को परमात्मा पर मत थोपें।
परमात्मा जटिल नहीं, जटिल आप हैं।
लेकिन जब भी दोष दूसरे पर दे दिया जाए,
हम निर्दोष होकर शांत और मजे में हो जाते हैं।
अपनी कठिनाई पहचानें,
अपनी कांप्लेक्सिटी पहचानें,
और पहचानते ही सरलता शुरू हो सकती है।
और मैं यह नहीं कहता कि कल शुरू हो सकती है।
अभी और इसी वक्त शुरू हो सकती है,
आप यहीं से सरल होकर
वापस लौट सकते हैं, इसी वक्त।
मुट्ठी बांधी है, मत बांधें,
और आप एक दूसरे आदमी होकर चल पड़े।
दूसरे आदमी—इसी क्षण! अभी और यहीं!
लेकिन अगर आपने कहा कि कल देखेंगे,
जटिलता शुरू हो गई। क्योंकि कल पर
टालना जटिल आदमी का लक्षण है।
जिंदगी कल के लिए नहीं रुकती,
जिंदगी अभी और यहीं है।
हो सकता है जो वह अभी हो सकता है और यहीं,
दिस वेरी मोमेंट, इसी क्षण में!
लेकिन जो इस क्षण में नहीं हो सकता,
आप कहते हैं. ठीक कहते हैं, सोचूंगा,
विचार करूंगा, पूछूंगा, कल कुछ करूंगा।
बस जटिलता के सब रास्ते खोल दिए गए।
सोचने से आदमी और जटिलता में जाएगा।
करने से और जटिलता में जाएगा।
कल पर पोस्टपोन करने से और जटिलता में जाएगा।
अभी और यहीं जटिलता को देख लें,
पहचान लें—कहां मैं जटिल हूं! फिर किसको कहना है?
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